Thursday, August 30, 2018

वो देश जहां हर घर में कठपुतलियां लटकी होती हैं, पर क्यों?

जो काम कभी इंसान या बड़ी-बड़ी क्रांतियां नहीं कर पातीं, कुछ बेजान चीजें कर जाती है. हो सकता है सुनने में ये थोड़ा अजीब लगे, लेकिन यूरोप के देश चेक रिपब्लिक के बारे में ये बात सौ फ़ीसदी खरी है.
कठपुतलियां, ना सिर्फ़ आज के चेक रिपब्लिक की पहचान हैं, बल्कि ये ख़ुद में कई सदियों का इतिहास समेटे हैं. आपको जानकर हैरानी होगी कि इन कठपुतलियों की वजह से ही चेक लोग आज अपनी पारंपरिक ज़बान बोल पा रहे हैं. इन कठपुतलियों ने चेक संस्कृति और भाषा को संजोने में अहम किरदार निभाया है.
17वीं सदी में जब बोहेमिया राज्य पर ऑस्ट्रिया के हैब्सबर्ग राजवंश का राज था, तो उस दौर में चेक ज़बान पूरी तरह ग़ायब हो गई थी. ये वो दौर था जब ईसाई मज़हब प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक दो हिस्सों में बंट गया था. उनके बीच वर्चस्व की लड़ाई जारी थी.
इस दौर में बेला होरा की लड़ाई हुई. इसे व्हाइट माउंटेन की लड़ाई भी कहा जाता है. ये माउंटेन मौजूदा चेक रिपब्लिक में है. इस लड़ाई में प्रोटेस्टेंट बोहेमिया को कैथोलिकों के हाथों मुंह की खानी पड़ी थी.
चेक रिपब्लिक के इतिहास में ये लड़ाई सबसे ज़्यादा अहमियत वाली है. इस लड़ाई के बाद ही यूरोप दो हिस्सों में बंट गया था और कई तरह की सियासी, सामाजिक और सांस्कृतिक सरहदें बन गई थीं.
साथ ही चेक गणराज्य पर ऑस्ट्रिया के हैब्सबर्ग राजवंश की हुकूमत क़ायम हो गई थी. ये लड़ाई क़रीब 30 साल तक चली. आख़िर में चेक प्रोटेस्टेंट को ऑस्ट्रिया के कैथोलिक ने मात दे दी.
इस जंग में जो चीज़ सबसे ज़्यादा दांव पर लगी थी, वो थी चेक लोगों की ज़बान, जो उनकी पहचान थी. चेक गणराज्य के नए शासक फ़र्डिनेंड द्वितीय ने चेक लोगों पर जर्मन भाषा थोप दी थी. उसे ग़ैर-कैथोलिक लोग बिल्कुल पसंद नहीं थे. वो उन्हें अपनी पहचान के लिए ख़तरा मानते थे.
शुरूआत में बुद्धिजीवी वर्ग ने इसका विरोध किया था. लेकिन, बाद में उन्हें भी शासक वर्ग की भाषा ख़ुद पर लादनी पड़ी. यहां तक कि कलाकारों को भी सिर्फ़ जर्मन भाषा में ही अभिव्यक्ति की इजाज़त दी गई.
ऐसे में चेक ज़बान, भाषा से महज़ एक बोली में सिमट कर रह गई, जिसे कुछ ही लोग बोलते थे. 1600 में जब प्रोटेस्टेंट कोर्ट ने चेक राजधानी प्राग को छोड़ा तो ये देश और दो सौ साल पीछे चला गया.
जिन लोगों को अपनी ज़बान से ख़ास लगाव था, उन्होंने इसे बचाने के लिए एक नायाब तरीक़ा ढूंढ निकाला. उन्होंने अपना विरोध जताने के लिए कठपुतली का इस्तेमाल किया. दरअसल फ़र्डिनेंड द्वितीय के ज़माने में सिर्फ़ कठपुतलियों को ही चेक भाषा बोलने की इजाज़त थी.
17वीं सदी में चेक रिपब्लिक के नक़्क़ाश चर्च के लिए कुर्सियों पर नक़्क़ाशी करते थे. लेकिन इंसानी चेहरे उकेरने में माहिर नहीं थे. लिहाज़ा उन्होंने अजीब तरह के चेहरे बनाने शुरू कर दिए और इनके माध्यम से वो अपनी भाषा को व्यक्त करते थे.
हालांकि ऐसे मुठ्ठी भर लोगों की कोशिशों से ख़त्म होती एक ज़बान का वजूद बचा पाना दूर की कौड़ी लगता था. लेकिन इन लोगों की ये कोशिश कठपुतलियों की डोरियों में ऐसी बंधी कि विरासत बनकर कई नस्लों तक चलती रही. यही वजह है इन कठपुतलियों की चेक लोगों के दिलों में ख़ास जगह है.
चेक गणराज्य की राजधानी प्राग के बाज़ारों में लगभग हरेक दुकान में कठपुतलियां लटकी नज़र आ जाएंगी. ज़्यादातर कठपुतलियां आज भी लकड़ी की बनाई जाती हैं. इन कठपुतलियों में राजा-रानी, चुड़ैल, किसान, जानवर सभी क़िस्म की मिल जाएंगी.
फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि एक दौर में ये लोगों की ज़बान और उनके जज़्बात का इज़हार करती थीं और आज ये महज़ सजावटी सामान और बच्चों के खेलने भर के लिए रह गई हैं. आज भी गली कूचों में पपेट शो होते हैं. प्राग के नेशनल मैरिओनेट थियेटर में बड़े-बड़े लाइव पपेट शो का आयोजन किया जाता है. स्थानीय लोगों के साथ-साथ टूरिस्ट भी ये शो देखने आते हैं.
इन पपेट और कलाकारों की वजह से ही चेक गणराज्य की नौजवान पीढ़ी आज भी अपनी ज़बान बोल पा रही है. वो ज़बान जो सदियों पहले ख़ात्मे के कगार पर पहुंच चुकी थी.

Wednesday, August 15, 2018

“三孩政策”来临?猪年邮票引发热议

中国很可能会进一步修改“二胎政策”——这从官方推出的邮票可以看出端倪。
明年将会踏入猪年,中国邮政集团公司推出猪年特别版邮票,上面有两只大猪和三只小猪,表面看来与政策没有甚么关系,但网民纷纷议论,是否暗示中国即将为生育政策松绑。
微博网民发现,两年前“一孩政策”仍然实施的时候,中国推出了猴年邮票,上面印有两只小猴。
近日,中国政府积极鼓励夫妇生多一个小孩。地方政府提出诸如免税优惠、教育及房屋津贴等措施,吸引夫妇生小孩。
中国官媒也在暗示,政策很可能会有所改变。《新京报》发表的文章表示,“显然,二胎政策的放开并未对人口出生率的提高起到太大作用”。
1979年,中国推出具争议性的“一孩政策”,在2015年底撤销。但父母并没有急于生第二胎。年轻父母称,他们连一个小孩都难以养育,更何况要多生一个。
据中国媒体报道,以“快乐家庭”为主题推出邮票,今次已是第四年,其中一只猪的邮票是“象征着正在奔向美好的生活”,另外“五福齐聚”,两只大猪和三只小猪同时出镜,体现出“全家福”的概念,也寄托了新春时五福临门的美好祝福。
一般而言,中国政府会在过年前,围绕一些主题提出一些想法,数以千计的网民把邮票视为政府的一些暗示。
微博网民“山东马哥”找回以前的邮票,发现以前只是有一只猴子,2016年的就有一只猴妈妈和两只小猴子——邮票是在“一孩政策”取消前落实设计。
中国在1979年底推出“一孩政策”以降低国家出生率,虽然当年的生育率已经出现下跌,1970年每名女子平均诞下5.8个小孩,到1978年则是2.7个。
网民“sven_shi”分享了这次新的猪邮票,她说因为劳动人口每年减少2,500万人,成为需要社保供养的人口,希望大家理解为甚么现在不仅要鼓励生二胎,还要生三胎。
这则微博被转载超过1,000次,反映了中国人口老化问题的挑战,到2050年,估计全国超过四分之一的人,年龄超过65岁。
中国的生育率在全球来说属于偏低,一般认为每名女性平均要诞下2.1名小孩,才有足够新小孩去填补人口,但中国目前的数字,仍然是低于2.1。
中国同时因重男轻女传统,在“一孩政策”下,促使家庭倾向要男丁,如果怀孕得知是女性,有些人会选择放弃,结果产生性别失衡的问题,估计目前中国男性比女性多出三千多万人。
但政府目前争取年轻夫妇生育更多小孩的政策并没有成效。微博的网民都说,没有能力负担两个小孩。
一些网民说,怎么也养不到三个小孩,不需要“三胎政策”;亦有网民表示,目前经济和人民生活,都不适合有更多小孩;一些人就认为,教育制度需要改变。
其中一人说,“与其鼓励大家像猪一些人就提到,“三孩政策”会影响女性就业:“这会令企业更加不想聘用没有小孩的女性。”
而房价上涨也影响生育的意欲。
“我负担不了一间大屋,大屋也不是必需的;我负担不了养育一个孩子,所以孩子也不是必需的,”其中一名网民说。
事实上,邮票完全可能不是为了“三孩政策”而设计。2007年,那年的生肖邮票猪家庭,就有五只小猪。
但许多人相信中国会向前多走一步。有学者估计,中国有九成的可能在下一年全面放开生育政策。